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उत्सव-मेला चुनाव का !

Posted On: 29 Jan, 2017 हास्य व्यंग में

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लो भय्या जी आ गया लोकतंत्र का उत्सव –रंगबिरंगे ,भांति -भांति के झंडे -नारे -पोस्टरों से शहरों की दीवारें सज गयी हैं ,ऑफिस -चाय के ढाबों -पान की दुकानों और महफ़िलों में चर्चा -बहस -मुबाहसों के दौर गर्म हैं .वोटों के सौदागरों ने जाल डाल दिए हैं ,चूहेदानी लगा दी है ,फंसा दिया है कांटे में अपने अपने घोषणा पत्रों को –वादों के टुकड़े लगा दिए हैं .राम -रोजगार-किसान-मजदूर से लेकर लैपटॉप-मोबाइल जैसे मुद्दों के कबूतर चुनावी आसमान में उड़ाए जा रहे है

जाति-धर्म के आंकड़ों के गुना भाग के भरोसे राजदल चुनावी मेले में वोटों की लूटमपाट की जुगाड़ में हैं .विचारधारा विशेष के समर्थक उन नेताओं का एकाएक ह्रदय परिवर्तन हो गया है, जिनको लॉटरी का टिकट नहीं मिला है . वे क्रांतिकारी अन्य दलों में शिफ्ट हो गए हैं ,हो रहे हैं .अथवा अपने अपने दलों के ऑफिसों में कुर्सियां तोड़ रहे है -धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं .


हमारे अत्यंत दूरदर्शी अखबार -चेनलों ने चुनाव पूर्व ओपिनियन पोल के नतीजे भी घोषित करने शुरू कर दिए है . सब जानते हैं प्रायः:  ये अनुमान असत्य साबित हुए है. कभी कभी तीर में तुक्का लगा वो अलग बात है . पूरे पूरे पेज के विज्ञापनों से अखबार भरे हुए हैं .पता नहीं इन विज्ञापनों पर कितना खर्च हो रहा है . अनुमान है कि ५ राज्यों के चुनावों में ५-७ अरब धनराशि व्यय होगी , अधिक भी हो सकती है . मजे की बात यह है घोषणा पत्रों में राजदलों ने जो सपने दिखाए हैं -वो कब से देशवासियों की आँखों में सूख चुके है -कभी सच नहीं हुए . अगर ऐसा होता तो आजादी के इतने सालों बाद आज भी हर साल हजारों किसान आत्महत्या नहीं कर रहे होते . करोड़ों बच्चे कुपोषित नहीं होते . रोटी रोजगार -पानी-बिजली -शिछा -चिकित्सा -सुरछा-समभाव के मूल प्रश्न आज भी जस के तस हैं . राजनीति -शासन-प्रशासन राजमहलों के भोग-विलास में संलिप्त है . दर्जनों सुरछा -कर्मियों -लग्जरी गाड़ियों -लकदक पोशाकों से सुसज्जित राजनेता इस लोकतंत्र में विहार कर रहे हैं . -करोड़ों गरीब-मजदूर  देशवासियों को खुशहाली और सुरछा का स्वप्न दिखा रहे है ,दिखाते रहे है
.
क्या इस बार मतदाता अपेछा कृत भले प्रत्याशी को चुनकर देश को नयी दिशा देने जा रहा है ? क्योंकि मतदाता को समझ लेना चाहिए निर्वाचित प्रत्याशी आपको दगा देकर निजी स्वार्थ देखकर पाला बदल भी सकता है . आजकल ऐसा खूब हो रहा है -
इस विषय पर चेखव के एकांकी ” गिरगिट ” का स्मरण हो आया ,जिसमे नेताओं पर कटाच्छ किया गया है
गिरगिट गिरगिट ,
झटपट रंग बदल लो भाई
झटपट ढंग बदल लो
-इसीलिए सिर्फ एक बार अपने अपने छेत्र से भले प्रत्याशियों को जिताइये – शायद नयी शुरुआत हो –कुछ बदले –बाकी -जो है सो तो है ही . आप भी देख रहे है ,समझ रहे है –पार्टियों के न्यारे न्यारे करतब -खेल ..

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