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चंदा मामा दूर के !

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राजनीति के चंदा मामा कौन है ?—हर कोई जानना चाहता है-जानना चाहिए –कौन है जो राजनीतिक पार्टियों को चंदा देते है और क्यों ? राजनीतिक पार्टियों को चंदे का हिसाब किताब क्या है ? कोई जानता है – क्या जानना चाहिए –? यदि नहीं तो क्यों ? दोस्त ,यही तो गंगोत्री है, जिससे पता चलेगा कि गंगा किसके इशारे पर बह रही है .अब आप ही बताओ आप किसी को १०-२०-१०० रुपए का चंदा क्यों दोगे ? सिर्फ इसलिए ना कि आपके बुरे वक़्त में काम आये –है ना यही बात – तो ये चंदा मामा लोग किसी पार्टी को क्यों चंदा देते है ? ये सवाल तो बनता है ना –फिर इसका खुलासा क्यों नहीं होना चाहिए कि किस पार्टी को किस पूंजीपति ने चंदा दिया है और किस पार्टी के पास कितना चंदा है ? क्यों नहीं खुलासा होना चाहिए ? हर पार्टी को अपना हिसाब -किताब जनता के सामने रखना चाहिए –और बताना चाहिए कि जिस पूंजीपति से चंदा लिया है- उसको क्या फायदा दिया है ? —इतना हरिश्चन्द्र तो तो कोई है नहीं –फिर भी सार्वजनिक रूप से चंदे का हिसाब स्पस्ट रखना बुद्धिमानी है –ज़माना खराब है,


आप सत्ताधारी लोग अपने अलावा सबको कालाधनिया घोषित कर दिया है –जितने लोग बैंक के सामने अपना पैसा निकालने में लगे है ,सब के सब काले चोर कह दिया है आपने –वाह साब वाह –पता है ६०-७० लोग लाइन में या आपकी नीति के कारण जान दे दिए है –शादी -ब्याह के कारण फांसी झूल गए है –सब काले चोर?  —ऊपर वाला आपको माफ़ नहीं करेगा –मानते है आप कालेधन के कुबेरों को पकड़ने के लिए बढ़िया काम किये , लेकिन इससे पहिले कुछ सोचा या नहीं –शादी- ब्याह का मौसम के बारे में – फसल के बुवाई के मौसम के बारे में भी कुछ नहीं सोचा —? धत्ततेरे क़ी इस टाइम में सर्जिकल करने का आपको किसने सलाह दिया —आप सोचो ये ६०-७० लोगों क़ी हत्या का आरोप आप पर खामखा लग गया ना— इनके परिवार वाले आपको दुआ देंगे क्या –आपकी नीति का समर्थन करेंगे ? आपको क्या बड़े लोग है –कोई चिंता नहीं. अरे मजदूर –किसान के बारे में सोचो —सब छूट गया –कारखाने बंद –रोजी-रोटी बंद –और दो जून क़ी रोटी भी बंद –वाह साब वाह हर सत्ताधारी कहता है तुम मुझे अपना वर्तमान दो ,में तुम्हे सुनहला भविष्य दूंगा —नेता मांगे कुर्बानी —नेता को प्यारी कुर्बानी — है हिम्मत अपनी राजनीतिक पार्टी के चंदे का हिसाब किताब देने क़ी ? संसद में बिल लाने क़ी सब पार्टियां अपने चंदे का हिसाब देंगी ?

धीरे धीरे पता चला है चुनावो में प्रमुख राजदल हजारों करोड़ प्रचार में खर्च करते है –कहाँ से आता है ये रुपया –क्या ये सफ़ेद धन होता है ? अरे साहेब राजनीति में अमर होना है तो एक बार सांस खींचकर प्रहार कीजिये ना इस प्रपंच पर –चुनाव सुधार कीजिये ना –ये नोटंकी बंद कीजिये -बंद कीजिये ये ड्रामा .बरसों से आम जनता ” गरीबी हटाओ ” की राजनीति देखती आ रही है –और देश में गरीबी ,कुपोषण -भ्रस्टाचार का आंकड़ा बढ़ता गया है –रोग बढ़ता गया ज्यो ज्यो दवा की . सांसद-विधायक के वेतन-भत्ते मिलाकर कितना होता है? —कभी सोचा है आयकर के दायरे में लाया जाए इन सबको ? ये फ़रिश्ते है क्या ? इनको सो खून माफ़ क्यों ? संसद की दहलीज पर सर नवाकर वादे करना और बात है कि संसद के दागदार प्रतिनिधियों का हिसाब किताब करेंगे –संसद निर्मल -स्वच्छ करेंगे –लेकिन कब ?
ये जनता है सब जानती है -समझती है -बुझती है –और सबका हिसाब करती है समय आने पर –प्रतीछा कीजिये !



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