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गीदड़ की मौत ?

Posted On: 11 Dec, 2015 लोकल टिकेट,social issues में

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सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया है दिल्ली सहित देश के महानगर गैस चेम्बर बन गए है तो पूरे देश को चिंतित होना स्वाभाविक है- यद्यपि वैज्ञानिक रिसर्च ने लगातार इस सम्बन्ध में चेताया है -कहावत पुरानी है गीदङ की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है —-अब कहा चाहिए मनुष्य की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है ==मोटर कार ,,ट्रक और धुंवा उगलती फैक्ट्रियो ने हमारे शहरों को गैस चैंबरों में तब्दील कर दिया है और नागरिक इस गैस चेंबर में जीवन व्यतीत करने को अभिशप्त है ———? बालक-बूढ़े जवान नागरिक गंभीर बीमारियो से ग्रस्त हो रहे है।देश में मानव जीवन को दरकिनार कर जिस तरह से विकास की परिकल्पना की गयी है उससे अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारना ही कहा जाना चाहिए।
भले ही इस मूर्खतापूर्ण तरीके से किये जा रहे विकास की चकाचोंध से देश प्रगति कर रहा है, लेकिन हाँफते -खांसते -पीले बीमार नागरिको का क्या ? जिस देश के चमचमाते शहरो में हम सांस नहीं ले सकते -दम घुटता है -तो राजनेताओ को ही नहीं देशवासियो को गंभीर हो जाना चाहिए -ये महासंकट है -इस महामारी से बचने के लिए हर संभव प्रयास करने होंगे ,अगर देश के वर्तमान को बचाना है –और भविष्य को भी।
कहा जाता है अगर मानव देह पर राख मल दी जाए तो देह के रोमछिद्र बंद हो जाते है और मृत्यु अवश्यम्भावी है —शास्त्र-विज्ञान कहता है पृथ्वी संयुक्त है –पृथक पृथक विभिन्न देशो के रूप में हमने स्वीकार किया है –यदि समूची पृथ्वी को मानव देह के रूप में देखे तो क्या शहर -क्या गाँव कोलतार की लगातार बढ़ती सड़को ने पृथ्वी के रोम छिद्र बंद करने का काम ही किया है। उस पर निरंतर किसी न किसी देश में चलते युद्ध में बम मिसाइल -बारूद -रासायनिक हमलो ने प्रकृति का संतुलन बेतरह बिगाड़ दिया है -परिणामत प्राकृतिक आपदाओ में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ोत्तरी हुई है -हाल की घटनाओ में हजारो नागरिक मारे गए है -मारे जा रहे है . वैज्ञानिक भी प्रकृति के तांडव से हैरान है -परेशान है।
इसलिए समय आ गया है मानव मूल्य सर्वोपरि रखकरही विकास की रूपरेखा बनायीं जाए। .मानव को बचाना है ,मनुष्यता को बचाना है और पृथ्वी को भी सरांछित करना है –पृकृति से अनावश्यक छेड़छाड़ विनाशकारी सिद्ध होगी।
आज ही तय करें क्या हम गीदड़ की मौत मरना पसंद करेंगे ?



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